पंजाब में आखिर कौन फैला रहा है खून-खराबे का डर?

पंजाब ने बहुत कम समय में बहुत ज्यादा गोलियों की आवाज सुनी है। कोई पुलिसकर्मी ड्यूटी पर निकलता है और घर वापस नहीं लौटता। कोई सरपंच दिनदहाड़े गोलियों का निशाना बन जाता है। कोई सोशल मीडिया क्रिएटर अपनी गाड़ी लेने जाता है और उसकी हत्या कर दी जाती है। कोई दूसरा पुलिस अधिकारी घात लगाकर किए गए हमले में किसी तरह बच जाता है। कई मामलों में हमलावर मोटरसाइकिल या स्कूटर पर आते हैं, नजदीक से गोली चलाते हैं और कुछ ही पलों में गायब हो जाते हैं। फिर घंटों या दिनों बाद किसी गैंगस्टर अकाउंट या किसी अस्पष्ट संगठन की ओर से सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी लेने का दावा सामने आता है। पुलिस के सामने तब यह तय करने की चुनौती होती है कि दावा असली है, अवसरवादी है या जांच को भटकाने की कोशिश।
ये सभी मामले आपस में जुड़े हुए नहीं हैं और यही बात शुरुआत में स्पष्ट करना जरूरी है। पंजाब पुलिस ने भी हिंसा की अलग-अलग धाराओं के बीच फर्क किया है। कुछ हत्याएं निजी दुश्मनी या आपराधिक रंजिश से जुड़ी हो सकती हैं, कुछ मामलों में गैंगस्टर कनेक्शन की जांच हो रही है, जबकि पुलिसकर्मियों पर हमलों में जांच एजेंसियों ने पाकिस्तान-आधारित हैंडलरों की संभावित भूमिका की बात कही है। दूसरी ओर सोशल मीडिया हस्तियों की हत्याओं ने गैंगस्टरवाद, सतर्कतावादी हिंसा और तथाकथित “मोरल पुलिसिंग” को लेकर अलग चिंता खड़ी की है।
इन सभी घटनाओं को एक ही बड़ी साजिश का हिस्सा बताने का फिलहाल कोई जिम्मेदार आधार नहीं है। लेकिन पंजाब की स्थिति चिंताजनक होने के लिए किसी एक बड़ी साजिश का होना जरूरी भी नहीं है। असल चिंता उस माहौल की है जो इन घटनाओं के आसपास उभरता दिखाई दे रहा है: अवैध हथियार, आसानी से प्रभावित किए जा सकने वाले युवा, नशे और तस्करी के नेटवर्क, विदेश में बैठे गैंगस्टर, सोशल मीडिया के जरिए धमकी और छोटी से छोटी रंजिश का अंत भी गोली से करने की बढ़ती प्रवृत्ति। डर केवल यह नहीं है कि अगली हत्या कब होगी। इससे बड़ा खतरा यह है कि कहीं लक्षित हिंसा धीरे-धीरे पंजाब के लिए सामान्य खबर न बन जाए।
जब वर्दी भी निशाना बनने लगे
सबसे गंभीर चेतावनी पुलिसकर्मियों पर हो रहे हमलों से आती है। सितंबर के अंत तक सामने आई रिपोर्टों के अनुसार लगभग छह महीनों के भीतर पंजाब पुलिस के चार कर्मियों की हत्या हो चुकी थी। जांचकर्ताओं ने इस संभावना की भी जांच की कि कुछ हमलों में पाकिस्तान-आधारित हैंडलर, स्थानीय भर्ती और पहले से मौजूद तस्करी चैनलों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है। पुलिस सूत्रों ने यह भी दावा किया कि बेरोजगार युवाओं, नशे की लत से जूझ रहे लोगों या जल्दी पैसा कमाने की इच्छा रखने वालों को निशाना बनाकर हथियार दिए जा सकते हैं और उन्हें हमलों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
फरवरी में गुरदासपुर जिले की सीमा पट्टी में एक चेकपोस्ट पर एएसआई गुरनाम सिंह और होम गार्ड जवान अशोक कुमार की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसके बाद वर्ष के दौरान पुलिसकर्मियों को निशाना बनाने वाली और घटनाएं सामने आईं। मई में मजीठा के पास एएसआई जोगा सिंह की हत्या हुई। सितंबर में अमृतसर के भगतांवाला अनाज मंडी क्षेत्र के पास पीसीआर ड्यूटी कर रहे एएसआई हरजीत सिंह को गोली मार दी गई। कुछ ही हफ्तों बाद अजनाला के पास जीआरपी एएसआई सुखचैन सिंह एक और गोलीबारी में घायल हुए।
अजनाला हमले के दो दिन बाद “तहरीक-ए-तालिबान हिंदुस्तान” या टीटीएच नाम के एक अस्पष्ट समूह ने सोशल मीडिया पोस्टर के जरिए जिम्मेदारी लेने का दावा किया। पंजाब पुलिस ने इस दावे की पुष्टि नहीं की और निजी रंजिश सहित दूसरे पहलुओं की भी जांच जारी रखी। यही नाम इससे पहले भी कुछ हमलों के बाद सामने आया था।
यह सावधानी बेहद जरूरी है। सोशल मीडिया पर कोई भी किसी हमले की जिम्मेदारी लेने का दावा कर सकता है। ऐसा दावा कभी भी जांच और सबूत की जगह नहीं ले सकता। लेकिन पुलिस द्वारा सामने रखे गए एक दूसरे पहलू को नजरअंदाज करना भी मुश्किल है। कुछ अधिकारियों ने संकेत दिया है कि टीटीएच जैसे नाम जरूरी नहीं कि पारंपरिक अर्थों में संगठित उग्रवादी ढांचा हों। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कथित तौर पर इसे “कागजी संगठन” जैसी संरचना बताया, जिसका नाम हिंसा को एक पहचान देने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि असली निर्देश देने वाले या मददगार कहीं और बैठे हों।
अगर यह आकलन जांच में सही साबित होता है, तो पंजाब के सामने खड़ी चुनौती पिछले दशकों की पारंपरिक उग्रवादी संरचनाओं से अलग हो सकती है। आज किसी विदेशी हैंडलर को बड़ा जमीनी नेटवर्क खड़ा करने की जरूरत शायद न पड़े। एक स्मार्टफोन, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप, पहले से मौजूद आपराधिक संपर्क, एक अवैध हथियार और पैसे के लालच में फंसा एक युवा ही काफी हो सकता है।
नशे, हथियार और कमजोर युवाओं का खतरनाक मेल
यहीं पंजाब की पुरानी नशे और सीमा पार तस्करी की समस्या एक और खतरनाक रूप ले सकती है। अगर नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए इस्तेमाल होने वाले रास्ते, संपर्क और लोग हथियारों की सप्लाई या लक्षित हमलों के लिए भी इस्तेमाल होने लगें, तो मामला सिर्फ नशे तक सीमित नहीं रहता। सवाल यह बन जाता है कि पंजाब के कमजोर युवाओं को कौन, कैसे और किस मकसद से इस्तेमाल कर रहा है।
ट्रिगर दबाने वाला व्यक्ति शायद पूरी योजना के बारे में कुछ भी न जानता हो। विदेश बैठा हैंडलर बड़ा मकसद जानता हो सकता है, गैंगस्टर आर्थिक उद्देश्य जानता होगा, तस्कर सप्लाई का रास्ता जानता होगा, लेकिन गोली चलाने वाले युवा को शायद केवल इतना पता हो कि उसे कितने पैसे मिलने हैं।
यही सबसे ज्यादा डरावना है। अगर पंजाब का युवा किसी और की साजिश, दुश्मनी या अपराध के कारोबार का सस्ता हथियार बन गया, तो नुकसान केवल एक परिवार का नहीं, पूरे समाज का होगा। और इस श्रृंखला को केवल गिरफ्तारियों से नहीं तोड़ा जा सकता। अगर नशा, बेरोजगारी, कर्ज, सामाजिक अलगाव और जल्दी पैसा कमाने का लालच युवाओं को आपराधिक भर्ती के लिए आसान लक्ष्य बनाते हैं, तो सुरक्षा के साथ सामाजिक और आर्थिक जवाब भी उतना ही जरूरी है। पंजाब अपने युवाओं को किसी और की लड़ाई का बारूद नहीं बनने दे सकता।
जब गांव की राजनीति भी बंदूक के साये में आ जाए
चिंता केवल पुलिस पर हमलों तक सीमित नहीं है। 6 अक्टूबर को तरन तारन जिले के तूत गांव के सरपंच अश्वनी कुमार देवगन को मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने गोली मार दी। उनका चालक भी घायल हुआ। शुरुआती पुलिस बयानों के अनुसार पहले कोई स्पष्ट धमकी, फिरौती की मांग या ज्ञात दुश्मनी सामने नहीं आई थी। बाद में परिवार ने धमकियों और पैसे की मांग के दावे किए। अब जांच को तय करना है कि वास्तविकता क्या है।
लेकिन मकसद जो भी निकले, घटना की तस्वीर अपने आप में परेशान करने वाली है। एक निर्वाचित गांव प्रतिनिधि सामान्य दिनचर्या में बाहर निकलता है, हमलावर आते हैं, गोलियां चलती हैं, एक परिवार शोक में डूब जाता है और एक गांव सोचता रह जाता है कि अगला कौन हो सकता है। पंजाब में हाल के समय में मौजूदा या पूर्व गांव प्रतिनिधियों से जुड़ी दूसरी हिंसक घटनाएं भी सामने आई हैं। कुछ मामलों को पुलिस ने जमीन विवाद या निजी दुश्मनी से जोड़ा है। यह फर्क करना बहुत जरूरी है। जमीन का झगड़ा आतंकवाद नहीं है। निजी रंजिश विदेशी साजिश का सबूत नहीं है। राजनीतिक आरोप अपने आप में तथ्य नहीं होते।
लेकिन आम लोग हिंसा को जांच की श्रेणियों में महसूस नहीं करते। वे गोलियों की आवाज सुनते हैं, अस्पताल के बाहर ढका हुआ शव देखते हैं, अंतिम संस्कार में जाते हैं और बार-बार सीसीटीवी में मोटरसाइकिल पर भागते हमलावर देखते हैं। धीरे-धीरे डर सामाजिक स्मृति का हिस्सा बनने लगता है।
जब ‘मोरल पुलिसिंग’ हत्या का बहाना बनने लगे
अमृतसर के सोशल मीडिया क्रिएटर मधुसूदन संधू, जिन्हें ऑनलाइन “मैड संधू” के नाम से जाना जाता था, की हत्या ने इस चिंता को एक अलग दिशा दे दी। 3 अक्टूबर को संधू अपनी कार लेने गए थे, तभी मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने उन पर गोली चला दी। हत्या के बाद विदेश-आधारित गैंगस्टर गोल्डी ढिल्लों से जुड़े एक सोशल मीडिया अकाउंट ने कथित तौर पर जिम्मेदारी लेने का दावा किया और संधू पर युवाओं को “खराब” करने का आरोप लगाया। पुलिस ने स्पष्ट किया कि ऑनलाइन दावों की पुष्टि बाकी है और गैंगस्टर तथा कॉन्ट्रैक्ट किलिंग सहित कई कोणों से जांच चल रही है।
यह अनिश्चितता कहानी का हिस्सा रहनी चाहिए, लेकिन हत्या के आसपास इस्तेमाल की गई “मोरल पुलिसिंग” वाली भाषा अपने आप में चिंताजनक है। पंजाब इससे पहले भी ऐसे मामले देख चुका है। जून 2025 में सोशल मीडिया क्रिएटर कंचन कुमारी, जो “कमल कौर भाभी” के नाम से जानी जाती थीं, की हत्या हुई। बठिंडा पुलिस ने उस मामले को “मोरल पुलिसिंग” से जोड़ा और दो लोगों को गिरफ्तार किया। पुलिस का कहना था कि आरोपियों को उनके सोशल मीडिया कंटेंट पर आपत्ति थी।
इस मामले ने पंजाब में एक बेहद असहज लेकिन जरूरी सवाल खड़ा किया था कि समाज की नैतिकता तय कौन करेगा। लोग किसी भी वीडियो को नापसंद कर सकते हैं। वे किसी कंटेंट को अश्लील, आपत्तिजनक या संस्कृति-विरोधी कह सकते हैं। धार्मिक नेता आलोचना कर सकते हैं। लेकिन आलोचना की सीमा वहीं खत्म हो जाती है जहां धमकी, हिंसा और हत्या शुरू होती है।
कोई गैंगस्टर नैतिकता का संरक्षक नहीं हो सकता। कोई हथियारबंद समूह यह तय नहीं कर सकता कि कोई नागरिक क्या पहने, क्या बोले या क्या पोस्ट करे। और कोई गोली पंजाब की संस्कृति की रक्षा नहीं कर सकती।
जब कोई व्यक्ति या समूह स्वयं को न्यायाधीश, जूरी और दंड देने वाला घोषित करने लगे, तो प्रश्न नैतिकता का नहीं रह जाता। वह कानून के शासन का प्रश्न बन जाता है। इसीलिए सिख पहचान और उन तत्वों के बीच स्पष्ट फर्क करना जरूरी है जो धार्मिक भाषा या सिख प्रतीकों को हिंसा के औचित्य के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
सिख इतिहास गैंगस्टरों की संपत्ति नहीं है। गुरु परंपरा को सोशल मीडिया धमकियों, सतर्कतावाद या हिंसा तक सीमित नहीं किया जा सकता। सिख इतिहास न्याय, मानव गरिमा, अत्याचार के विरोध और कमजोर की रक्षा की असाधारण मिसालों से भरा है। जब कोई अपराधी धार्मिक शब्दावली का इस्तेमाल करके हिंसा को उचित ठहराता है, तो वह इन मूल्यों की रक्षा नहीं करता, बल्कि उन्हें नुकसान पहुंचाता है।
सबसे बड़ा खतरा है डर का सामान्य हो जाना
पंजाब में जब भी हिंसक घटनाओं की एक श्रृंखला सामने आती है, तुरंत 1980 और 1990 के दशकों से तुलना करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। ऐसा करना उचित नहीं है। आज का पंजाब उस दौर का पंजाब नहीं है। सुरक्षा संस्थाएं अलग हैं, खुफिया क्षमताएं ज्यादा मजबूत हैं और सामाजिक तथा राजनीतिक परिस्थितियां भी बदल चुकी हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पंजाब की भारी बहुसंख्या हिंसा और उग्रवाद से कोई संबंध नहीं चाहती।
लेकिन इतिहास से सीखने के लिए उसका हूबहू दोहराया जाना जरूरी नहीं है।
हिंसा भी तकनीक के साथ बदलती है। जिस हैंडलर को कभी भौतिक कूरियर की जरूरत होती थी, वह आज एन्क्रिप्टेड ऐप पर निर्देश दे सकता है। जो प्रचार कभी पर्चों से फैलता था, वह आज कुछ सेकंड में महाद्वीप पार कर सकता है। कोई गैंगस्टर विदेश में बैठकर सोशल मीडिया के जरिए पंजाब के किसी गांव में भय का माहौल बना सकता है। किसी युवा को किसी संगठन का औपचारिक सदस्य बनने की भी जरूरत नहीं। उसे केवल एक लक्ष्य, एक हथियार और कुछ पैसे दिए जा सकते हैं।
इसलिए पंजाब को केवल गोली चलाने वाले व्यक्ति को नहीं देखना चाहिए। सवाल यह भी होना चाहिए कि हथियार कहां से आया, पैसा किसने दिया, लक्ष्य किसने चुना और किसने पंजाब के किसी युवा को यह विश्वास दिलाया कि किसी की जान लेना उसके लिए कमाई का साधन बन सकता है। इस समस्या को केवल पंजाब सरकार या केवल केंद्र सरकार के सिर डालना भी समाधान नहीं है। एक सीमावर्ती राज्य की सुरक्षा के लिए पंजाब पुलिस, केंद्रीय एजेंसियों, सीमा सुरक्षा बल और खुफिया तंत्र का समन्वय जरूरी है। अपराधी प्रशासनिक सीमाओं का सम्मान नहीं करते। गैंगस्टर इस बात की परवाह नहीं करते कि जांच किस एजेंसी के पास है। विदेश में बैठे हैंडलरों के लिए यह मायने नहीं रखता कि सफलता का श्रेय चंडीगढ़ को मिलता है या नई दिल्ली को।
जहां विदेशी भूमिका सबूत से साबित होती है, उसे पूरी तरह उजागर किया जाना चाहिए। जहां स्थानीय गैंगस्टर नेटवर्क सामने आता है, उसे तोड़ा जाना चाहिए। जहां हत्या निजी दुश्मनी का परिणाम हो, वहां यह बात भी उतनी ही स्पष्टता से कही जानी चाहिए। और जहां किसी हमले की झूठी ऑनलाइन जिम्मेदारी ली गई हो, उसे जल्दी उजागर किया जाना चाहिए। क्योंकि अनिश्चितता में अफवाह पनपती है, डर में गैंगस्टर का प्रभाव बढ़ता है और भ्रम में प्रचार अपनी जगह बना लेता है।
लेकिन यह लड़ाई केवल पुलिस नहीं जीत सकती। पंजाब को अपने युवाओं को लेकर भी कठिन सवाल पूछने होंगे। विदेश में बैठा कोई व्यक्ति पंजाब के युवा को पैसे के बदले हथियार उठाने के लिए क्यों तैयार कर सकता है? गैंगस्टर जीवनशैली में आकर्षण क्यों पैदा होता है? पिस्तौल कुछ युवाओं के लिए प्रतिष्ठा का प्रतीक क्यों बन जाती है? नशे, बेरोजगारी, कर्ज या सामाजिक निराशा से घिरा युवा कई बार शिक्षक, काउंसलर या रोजगारदाता से पहले किसी आपराधिक भर्ती करने वाले के संपर्क में क्यों आ जाता है? जो सुरक्षा व्यवस्था हमले के बाद शूटर को पकड़ती है, वह जरूरी है। लेकिन वह सामाजिक व्यवस्था जो अगले शूटर को बनने से पहले रोक दे, उससे भी ज्यादा जरूरी हो सकती है।
अंततः कीमत हर बार परिवार ही चुकाता है। उस पुलिसकर्मी का परिवार जो ड्यूटी से वापस नहीं लौटा, उस सरपंच के बच्चे जिसकी हत्या गांव की सड़क पर हुई, उस युवा के माता-पिता जो गैंग की दुनिया में फंसकर जेल या मुठभेड़ तक पहुंच गया, और वे नागरिक जो यह सोचने लगते हैं कि क्या सोशल मीडिया पर कोई बात लिखना भी किसी हथियारबंद व्यक्ति का ध्यान आकर्षित कर सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि क्या हर हत्या के पीछे एक ही नेटवर्क है। मौजूदा सबूत ऐसा निष्कर्ष निकालने की अनुमति नहीं देते। सवाल यह है कि क्या होता है जब गैंगस्टरवाद, अवैध हथियार, सीमा पार आपराधिक नेटवर्क, नशा, ऑनलाइन धमकी, विदेश-आधारित हैंडलरों द्वारा कथित भर्ती, नैतिकता के नाम पर सतर्कतावादी हिंसा और निजी दुश्मनियां एक ही सामाजिक वातावरण में एक साथ जगह बनाने लगती हैं।
इन सबका कमांड सेंटर एक होना जरूरी नहीं। परिणाम फिर भी एक हो सकता है: भय।
पंजाब को गंभीर होना चाहिए, लेकिन घबराना नहीं चाहिए। सतर्क रहना चाहिए, लेकिन पूरे समुदाय या समाज को संदेह की नजर से नहीं देखना चाहिए। उग्रवाद का विरोध करना चाहिए, लेकिन उसे सिख पहचान के साथ नहीं जोड़ना चाहिए। विदेशी दखल की जांच करनी चाहिए, लेकिन हर स्थानीय अपराध को विदेशी साजिश बताकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बचना चाहिए। और सुरक्षा को मजबूत करना चाहिए, बिना इस बात के कि चंडीगढ़ और नई दिल्ली के राजनीतिक मतभेद सहयोग को कमजोर कर दें।
पंजाब ने शांति के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकाई है। अनगिनत परिवार जानते हैं कि लंबे समय की हिंसा समाज को किस तरह तोड़ती है। बहुत से घर अस्पताल के लंबे गलियारों, अचानक आई मौत की खबर और अंतिम यात्रा का दर्द पहले ही देख चुके हैं। यह इतिहास डर पैदा करने के लिए नहीं है। यह सावधान करने के लिए है।
आज पंजाब के सामने खतरा यह जरूरी नहीं कि अतीत हूबहू लौट रहा है। खतरा यह है कि कहीं हिंसा का नया रूप हमारे सामने सामान्य न बन जाए और हम उसे पहचानने में देर न कर दें। ड्यूटी पर पुलिसकर्मी का गोली से मारा जाना कभी सामान्य खबर नहीं बन सकता। सरपंच की हत्या केवल एक और आंकड़ा नहीं बन सकती। धमकियों के बाद किसी सोशल मीडिया क्रिएटर की हत्या को “विवाद का परिणाम” कहकर किनारे नहीं किया जा सकता। और पंजाब के युवाओं को गैंगस्टरों या विदेशी हैंडलरों द्वारा कथित तौर पर भर्ती किया जाना केवल एक और कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं माना जा सकता। गोलियां अलग-अलग बंदूकों से चल सकती हैं। मकसद अलग हो सकते हैं। हमलों के पीछे खड़े लोग शायद कभी एक-दूसरे से मिले भी न हों। लेकिन हर बार जब हिंसा आसान होती है और भय परिचित लगता है, नुकसान पंजाब का होता है।
पंजाब ने अपनी शांति के लिए बहुत लंबा और दर्दनाक सफर तय किया है। उसका भविष्य विदेश में बैठे गैंगस्टरों, कथित हैंडलरों, नशा और हथियार नेटवर्कों या स्वयंभू नैतिक पहरेदारों के हाथ नहीं छोड़ा जा सकता। इस शांति की रक्षा अभी करनी होगी, इससे पहले कि एक और गोलीबारी हमारे लिए केवल एक और सुर्खी बनकर रह जाए।




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