भगत सिंह की 119वीं जयंती: वह क्रांतिकारी जिसे केवल एक नारे तक सीमित नहीं किया जा सकता

उम्र से कहीं बड़े हो गए एक क्रांतिकारी
भारत की राष्ट्रीय स्मृति में भगत सिंह का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। वह केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि एक गंभीर विचारक, औपनिवेशिक शासन के प्रखर आलोचक, असाधारण बौद्धिक अनुशासन वाले युवा और अंततः ऐसे शहीद थे जिनकी मृत्यु ने उन्हें उनकी छोटी-सी आयु से कहीं बड़ा प्रतीक बना दिया।
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को अविभाजित पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गांव में हुआ था, जो आज पाकिस्तान में है। उनका परिवार पहले से ही स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ था। उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह तथा स्वर्ण सिंह औपनिवेशिक शासन के विरोध से जुड़े थे। राजनीति उनके जीवन में बाद में आई कोई चीज नहीं थी, बल्कि उसी वातावरण का हिस्सा थी जिसमें उनका बचपन बीता।
पंजाब, जलियांवाला बाग और एक विद्रोही का निर्माण
भगत सिंह के राजनीतिक व्यक्तित्व को गढ़ने में पंजाब की निर्णायक भूमिका रही। इस प्रांत ने ब्रिटिश दमन के कुछ सबसे क्रूर रूप देखे थे, और 1919 का जलियांवाला बाग नरसंहार पूरी पीढ़ी की चेतना पर गहरा असर छोड़ गया।
लोकप्रिय कथाओं के अनुसार, बालक भगत सिंह जलियांवाला बाग गए और वहां की रक्तरंजित मिट्टी अपने साथ लेकर लौटे। यह प्रसंग चाहे शाब्दिक रूप में देखा जाए या प्रतीकात्मक रूप में, इतना स्पष्ट है कि इस घटना ने उनके मन पर औपनिवेशिक शासन की क्रूरता की अमिट छाप छोड़ी। पंजाब केवल उनकी जन्मभूमि नहीं था। वही वह राजनीतिक भूगोल था जिसने उन्हें दिखाया कि जब सत्ता पर कोई नैतिक नियंत्रण न रहे, तो औपनिवेशिक शासन किस रूप में सामने आता है।
लाहौर और विचारक भगत सिंह
भगत सिंह ने लाहौर के नेशनल कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की, जिसकी स्थापना लाला लाजपत राय ने ब्रिटिश नियंत्रण वाली शिक्षा व्यवस्था के विकल्प के रूप में की थी। लाहौर उनके वैचारिक और राजनीतिक विकास का केंद्र बना। वहीं उन्होंने क्रांतिकारी साहित्य, समाजवादी चिंतन, यूरोप के विद्रोही आंदोलनों के इतिहास और औपनिवेशिकता, वर्ग संघर्ष तथा राष्ट्रीय मुक्ति से जुड़े विचारों का अध्ययन किया।
यही वह पक्ष है जो भगत सिंह की केवल पिस्तौल थामे क्रांतिकारी वाली लोकप्रिय छवि को अधूरा साबित करता है। वह अत्यंत गंभीर पाठक थे। मार्क्स, लेनिन, बाकुनिन और दुनिया भर के क्रांतिकारी आंदोलनों पर लिखे साहित्य ने उनके चिंतन को प्रभावित किया। उनका प्रसिद्ध लेख "मैं नास्तिक क्यों हूं" यह बताता है कि वह केवल विद्रोह तक सीमित व्यक्ति नहीं थे, बल्कि तर्क, आत्मचिंतन और वैचारिक स्वतंत्रता को महत्व देने वाले युवक थे।
उनके लिए आजादी का अर्थ केवल अंग्रेजों की विदाई नहीं था
भगत सिंह के लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल इतना नहीं था कि अंग्रेज भारत छोड़ दें और उनकी जगह भारतीय शासक आ जाएं। राजनीतिक स्वतंत्रता यदि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन से रहित हो, तो उनके लिए वह अधूरी थी। वह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े। संगठन के नाम में ही यह स्पष्ट था कि उनका लक्ष्य केवल स्वतंत्र भारत नहीं, बल्कि अधिक समानतापूर्ण गणराज्य की स्थापना भी था।
उनकी सोच धीरे-धीरे केवल औपनिवेशिक विरोध से आगे बढ़ी। वह वर्ग, श्रमिक अधिकारों, किसानों की स्थिति और सामाजिक असमानता जैसे प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करने लगे।
इसीलिए उनके लिए क्रांति केवल सशस्त्र संघर्ष का पर्याय नहीं थी।
लाला लाजपत राय की मृत्यु और सॉन्डर्स हत्याकांड
1928 में साइमन कमीशन भारत आया, लेकिन उसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। इसका पूरे देश में व्यापक विरोध हुआ। लाहौर में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए और कुछ सप्ताह बाद उनका निधन हो गया। इसके बाद भगत सिंह और उनके साथियों ने प्रतिशोध का निर्णय लिया। उनका लक्ष्य पुलिस अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट था, जिसे वे लाठीचार्ज के लिए जिम्मेदार मानते थे। लेकिन पहचान की गलती के कारण दिसंबर 1928 में सहायक पुलिस अधीक्षक जे.पी. सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
यह घटना भगत सिंह के क्रांतिकारी जीवन के सबसे महत्वपूर्ण और विवादित प्रसंगों में से एक है। इसने औपनिवेशिक शासन के खिलाफ तीव्र आक्रोश और क्रांतिकारी हिंसा को राजनीतिक साधन के रूप में अपनाने की उनकी तत्परता दोनों को सामने रखा।
असेंबली बम कांड और विरोध की राजनीतिक रणनीति
8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की केंद्रीय विधान सभा में बम फेंके। इस कार्रवाई का उद्देश्य बड़े पैमाने पर लोगों को नुकसान पहुंचाना नहीं था। बम इस तरह इस्तेमाल किए गए थे कि वे प्रतीकात्मक धमाका करें और राजनीतिक संदेश दें।
दोनों ने पर्चे फेंके, "इंकलाब जिंदाबाद" के नारे लगाए और भागने का प्रयास नहीं किया।
उनका उद्देश्य था "बहरों को सुनाना" और अदालत को उस मंच में बदलना जहां ब्रिटिश शासन की नीतियों को चुनौती दी जा सके। यही वह क्षण था जिसने भगत सिंह को भूमिगत क्रांतिकारी से राष्ट्रीय प्रतीक बना दिया।
जेल के भीतर भी जारी रहा संघर्ष
भगत सिंह की लोकप्रियता उनके जेल जाने के बाद और बढ़ी। उन्होंने अन्य राजनीतिक कैदियों के साथ मिलकर लंबी भूख हड़ताल की। उनकी मांग थी कि भारतीय और यूरोपीय कैदियों के साथ समान व्यवहार किया जाए और राजनीतिक बंदियों को बेहतर सुविधाएं मिलें।
इस आंदोलन ने ब्रिटिश जेलों की परिस्थितियों पर पूरे देश का ध्यान खींचा। उनके साथी जतिन दास की 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद मृत्यु ने जनता में व्यापक रोष पैदा किया। अब भगत सिंह को केवल क्रांतिकारी हिंसा के संदर्भ में नहीं देखा जा रहा था। वह औपनिवेशिक अन्याय के विभिन्न रूपों के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बन चुके थे।
लाहौर षड्यंत्र केस और शहादत
भगत सिंह पर बाद में लाहौर षड्यंत्र केस में मुकदमा चला और उन्हें शिवराम राजगुरु तथा सुखदेव थापर के साथ फांसी की सजा सुनाई गई। 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में तीनों को फांसी दे दी गई।
उस समय भगत सिंह केवल 23 वर्ष के थे।
उनकी फांसी ने पूरे भारत में शोक और आक्रोश पैदा किया। उनकी युवावस्था, निर्भीकता और अपने कार्यों के परिणामों से बचने की कोशिश न करने वाले रवैये ने उन्हें राष्ट्रीय चेतना में शहीद का दर्जा दिलाया।
बंदूक से कहीं बड़ी थी उनकी विरासत
भगत सिंह की प्रासंगिकता केवल इसलिए नहीं है कि उन्होंने बहुत कम उम्र में प्राण दे दिए। उनकी विशेषता थी साहस, राजनीतिक रणनीति, वैचारिक विकास और गहरी बौद्धिकता का दुर्लभ मेल। वह सांप्रदायिक राजनीति के विरोधी थे। उस समय जब धार्मिक विभाजन सार्वजनिक जीवन को तेजी से प्रभावित कर रहे थे, वह साझा नागरिकता और साझा संघर्ष पर आधारित राजनीति की बात करते थे।
उनका राष्ट्रवाद संकीर्ण नहीं था। वह सामाजिक न्याय, मजदूरों के अधिकार, किसानों की मुक्ति और मानवीय गरिमा से जुड़ा हुआ था।
"इंकलाब जिंदाबाद" का उनके लिए असली अर्थ
आज "इंकलाब जिंदाबाद" को प्रायः विद्रोह के नारे के रूप में याद किया जाता है। लेकिन भगत सिंह के लिए क्रांति का अर्थ केवल अशांति या हिंसा नहीं था। वह बार-बार कहते थे कि क्रांति केवल बम और पिस्तौल का नाम नहीं है।
उनके लिए इसका अर्थ था अन्यायपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्थाओं में बुनियादी परिवर्तन।
यही शायद उनकी विरासत का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। वह स्वतंत्रता को केवल एक ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं देखते थे। वह उसे अधिक न्यायपूर्ण समाज के निर्माण की निरंतर प्रक्रिया मानते थे।
पंजाब का बेटा, भारत का नायक
पंजाब से भगत सिंह का संबंध उनकी कहानी को आज की सीमाओं से भी आगे ले जाता है। उनके जीवन से जुड़े कई स्थान, जिनमें लाहौर और उनका जन्मस्थान शामिल हैं, आज पाकिस्तान में हैं। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि भारत का स्वतंत्रता संघर्ष वर्तमान राजनीतिक सीमाओं में सीमित नहीं किया जा सकता।
पंजाब ने उन्हें गढ़ा, लाहौर ने उन्हें विचार दिया, औपनिवेशिक दमन ने उन्हें क्रांतिकारी बनाया और भारत ने उन्हें अपने राष्ट्रीय नायक के रूप में अपनाया।
सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है उन्हें पढ़ना
उनकी जयंती पर सबसे सार्थक श्रद्धांजलि यह नहीं है कि उन्हें केवल पोस्टर, नारे या राजनीतिक प्रतीक में बदल दिया जाए। सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है उन्हें पढ़ना। उस युवा को समझना जिसने धर्म, औपनिवेशिक शासन, वर्ग विशेषाधिकार, सांप्रदायिकता और अन्याय पर निर्भीकता से प्रश्न उठाए।
यह समझना कि उनके लिए देशभक्ति केवल बलिदान नहीं, विचार की भी मांग करती थी। भगत सिंह 15 अगस्त 1947 का स्वतंत्र भारत देखने के लिए जीवित नहीं रहे। लेकिन 1931 में फांसी के तख्ते तक पहुंचने से पहले ही वह एक पूरी पीढ़ी के लिए स्वतंत्रता के अर्थ को बदल चुके थे।
लगभग एक सदी बाद भी वह भारत की जनचेतना में जीवित हैं, केवल इसलिए नहीं कि वह आजादी के लिए मरने को तैयार थे, बल्कि इसलिए भी कि उन्होंने अपने छोटे से जीवन में यह सवाल उठाया कि आजादी आखिर किसलिए होनी चाहिए।




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