बंदी सिंह और पंजाब 2027: पुराने घावों को फिर कुरेदे बिना अतीत के सवालों का समाधान जरूरी
- SikhsForIndia

- 1 दिन पहले
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जैसे-जैसे पंजाब 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है, राज्य के एक बेहद संवेदनशील दौर से जुड़ा मुद्दा फिर मुख्यधारा की राजनीति में जगह बना रहा है। उग्रवाद से जुड़े मामलों में दोषी ठहराए गए कैदियों के लिए आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले शब्द "बंदी सिंह" को लेकर बहस ने विरोध प्रदर्शनों, धार्मिक लामबंदी और पैरोल या रिहाई की नई मांगों के साथ एक बार फिर जोर पकड़ लिया है।
फिलहाल सबसे अधिक चर्चा जगतार सिंह हवारा के मामले की है, जिसे 1995 में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या की साजिश में भूमिका के लिए दोषी ठहराया गया था। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने हवारा को अपनी बीमार मां से मिलने के लिए 10 दिन की पैरोल देने का समर्थन किया है और हाल ही में उसके परिवार और समर्थकों से मुलाकात भी की। यह राज्य सरकार के पहले के रुख से महत्वपूर्ण बदलाव है, जब उसने हवारा की पैरोल का विरोध किया था। अब यह मामला इस व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है कि पंजाब और केंद्र को उग्रवाद के दौर से जुड़े कैदियों के मामलों से किस तरह निपटना चाहिए।
लेकिन यह ऐसा विषय है जिसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अधिक परिपक्वता और संवेदनशीलता के साथ संभालने की जरूरत है।
पंथक मांग से राजनीतिक मुद्दे तक
बंदी सिंहों का मुद्दा नया नहीं है। कौमी इंसाफ मोर्चा जनवरी 2023 से चंडीगढ़-मोहाली सीमा के पास इस मांग को लेकर अभियान चला रहा है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी भी याचिकाओं, ज्ञापनों और धार्मिक कार्यक्रमों के माध्यम से इस मुद्दे को लगातार उठाती रही है।
जो बदला है, वह है इसकी राजनीतिक दृश्यता और महत्व।
कौमी इंसाफ मोर्चा द्वारा 21 अगस्त को बुलाए गए पंजाब बंद को राज्य के कई हिस्सों में समर्थन मिला। कई स्थानों पर बाजार बंद रहे, यातायात प्रभावित हुआ और पंथक संगठनों के साथ कुछ किसान संगठनों ने भी इसमें भाग लिया। प्रमुख जिलों में भारी पुलिस बल तैनात किया गया, हालांकि आंदोलन काफी हद तक शांतिपूर्ण रहा।
इसके कुछ दिनों बाद एसजीपीसी ने ऐतिहासिक गुरुद्वारों और अपने शिक्षण संस्थानों में बंदी सिंहों को राहत देने की मांग को लेकर अरदास कार्यक्रम आयोजित किए। इससे पहले भी एसजीपीसी नौ सिख कैदियों से संबंधित मांगों को लेकर हस्ताक्षर अभियान चला चुकी है, जिसके लिए उसने लगभग 26 लाख लोगों के समर्थन का दावा किया था।
इस तरह यह मुद्दा अब कुछ छिटपुट प्रदर्शनों तक सीमित नहीं है। इसके साथ धार्मिक, मानवीय और चुनावी पहलू जुड़ गए हैं। विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ हर प्रमुख राजनीतिक दल के पास इस मुद्दे पर ध्यान देने के अपने कारण हैं। आम आदमी पार्टी को सिख मतदाताओं के बीच अपना समर्थन बनाए रखना है। शिरोमणि अकाली दल अपने पारंपरिक पंथक राजनीतिक आधार को दोबारा मजबूत करने की कोशिश में है। कांग्रेस अभी भी राज्य की प्रमुख राजनीतिक ताकतों में शामिल है, जबकि भाजपा पंजाब में अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने का प्रयास कर रही है। इसके साथ नई सिख-केंद्रित राजनीतिक ताकतें भी प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। खतरा यह है कि अनसुलझे कानूनी मामलों को पंथक राजनीति में प्रतिस्पर्धा का साधन न बना दिया जाए।
हवारा का मामला इस मुद्दे की जटिलता दिखाता है
जगतार सिंह हवारा का मामला बताता है कि इस बहस को केवल "रिहाई या रिहाई नहीं" के सवाल तक सीमित नहीं किया जा सकता। हवारा को बेअंत सिंह की हत्या की साजिश में दोषी ठहराया गया था। बेअंत सिंह 31 अगस्त 1995 को चंडीगढ़ सिविल सचिवालय के बाहर हुए आत्मघाती बम विस्फोट में अन्य लोगों के साथ मारे गए थे। हवारा को पहले मौत की सजा सुनाई गई थी, जिसे बाद में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने उम्रकैद में बदल दिया।
लेकिन मौजूदा मांग उसकी सजा या दोषसिद्धि समाप्त करने की नहीं, बल्कि अस्थायी पैरोल की है।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने जुलाई में उसकी पैरोल अर्जी पर विचार के लिए समयबद्ध प्रक्रिया तय की थी। अदालती कार्यवाही में अधिकार क्षेत्र का सवाल भी सामने आया, क्योंकि हवारा फिलहाल दिल्ली की मंडोली जेल में बंद है। यह अंतर महत्वपूर्ण है। मौजूदा कानून के तहत किसी कैदी की पैरोल अर्जी पर विचार किए जाने का समर्थन करना उस अपराध को उचित ठहराना नहीं है, जिसके लिए उसे दोषी ठहराया गया है।
इस मामले में विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से मानवीय आधार पर विचार करने की बात कही गई है। पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने हवारा की पैरोल का समर्थन किया है। भाजपा से जुड़ी आवाजों ने भी मानवीय आधार पर विचार की बात कही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह बिट्टू ने भी हवारा को उसकी मां से मिलने की अनुमति देने का समर्थन किया है। जब हत्या का शिकार हुए व्यक्ति का परिवार भी मानवीय राहत और अपराध को उचित ठहराने के बीच अंतर कर सकता है, तो पंजाब के राजनीतिक विमर्श में भी यह अंतर कायम रहना चाहिए।
समान व्यवहार का सवाल
इस मुद्दे के लगातार चर्चा में बने रहने का एक अन्य कारण सिख समुदाय के कुछ वर्गों में यह धारणा है कि अलग-अलग कैदियों के साथ समान व्यवहार नहीं किया जाता। यह धारणा अगस्त में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को एक और 21 दिन की फरलो मिलने के बाद और मजबूत हुई। रिपोर्टों के अनुसार, 2017 में दोषी ठहराए जाने के बाद यह उसकी 17वीं अस्थायी रिहाई थी। सिख संगठनों ने इन बार-बार मिलने वाली अस्थायी रिहाइयों की तुलना हवारा के लिए पैरोल हासिल करने में आ रही कठिनाइयों से की। कानूनी रूप से ये मामले जरूरी नहीं कि समान हों। अलग-अलग कैदियों पर अलग अधिकार क्षेत्र, सजाएं, जेल नियम और सुरक्षा आकलन लागू हो सकते हैं।
लेकिन सरकारों को कानून के समान अनुप्रयोग को लेकर जनता के भरोसे के महत्व को भी समझना चाहिए।
इसका समाधान यह नहीं है कि एक कैदी को इसलिए पैरोल न दी जाए क्योंकि दूसरे को नहीं मिली। उसी तरह किसी को केवल इसलिए पैरोल नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि किसी अन्य कैदी को मिल चुकी है। सही सिद्धांत सीधा है: तुलनीय मामलों में कानूनी मानदंडों को पारदर्शी और समान तरीके से लागू किया जाना चाहिए।
राजोआना और समय पर फैसले की जरूरत
बलवंत सिंह राजोआना का मामला इस बहस में एक और आयाम जोड़ता है। बेअंत सिंह हत्या मामले में दोषी ठहराए गए और मौत की सजा पाए राजोआना कई दशकों से जेल में हैं, जबकि उनकी दया याचिका और मौत की सजा को बदलने से जुड़ा मामला लंबे समय से अनसुलझा है। ऐसे मामलों को राजनीति और प्रशासन के बीच अनिश्चित समय तक लंबित नहीं रखा जाना चाहिए।
एक संवैधानिक लोकतंत्र को आतंकवाद और राजनीतिक हिंसा के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है। पंजाब शायद अधिकांश राज्यों से बेहतर जानता है कि ऐसी सख्ती क्यों जरूरी है। लेकिन लोकतंत्र की ताकत इस बात से भी दिखाई देती है कि वह कठिन मामलों को दशकों तक लटकाए रखने के बजाय स्थापित कानून के अनुसार उन पर फैसला करता है। यहां केंद्र और राज्य स्तर की संस्थाएं दोनों रचनात्मक भूमिका निभा सकती हैं।
बंदी सिंहों के मुद्दे को एक और केंद्र बनाम पंजाब विवाद में नहीं बदलना चाहिए। अलग-अलग मामलों में अलग सरकारें, जेल प्रशासन, अदालतें और संवैधानिक प्राधिकरण शामिल हैं। हर देरी को जानबूझकर नई दिल्ली द्वारा की गई कार्रवाई के रूप में पेश करना राजनीतिक रूप से सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन इससे वास्तविक मामलों के समाधान में मदद नहीं मिलती।
जरूरत संस्थागत स्पष्टता की है।
हिंसा के महिमामंडन के लिए कोई जगह नहीं
इसके साथ एक सीमा बिल्कुल स्पष्ट रहनी चाहिए। कैदियों के प्रति मानवीय संवेदना पंजाब के उग्रवाद वाले दौर को रोमांटिक या महिमामंडित करने का माध्यम नहीं बननी चाहिए। 1980 और 1990 के दशकों की हिंसा में आम नागरिक, राजनीतिक प्रतिनिधि, पुलिस और सुरक्षाकर्मी मारे गए और हजारों परिवारों के लिए दर्दनाक यादें छोड़ गईं। बेअंत सिंह स्वयं भी 1995 में अन्य लोगों के साथ हत्या का शिकार हुए थे।
पंजाब केवल एक पक्ष के दुख को याद करके मेल-मिलाप की दिशा में आगे नहीं बढ़ सकता। इसलिए राजनीतिक हत्याओं से जुड़े व्यक्तियों के महिमामंडन के प्रयासों को भी गंभीरता से देखने की जरूरत है। किसी कैदी के मामले पर कानून के अनुसार विचार करने की मांग और राजनीतिक हिंसा को वीरतापूर्ण या उचित कार्रवाई के रूप में पेश करने के बीच बुनियादी अंतर है। पंजाब के धार्मिक और राजनीतिक नेतृत्व को इस अंतर को बनाए रखना चाहिए।
पंजाब को ध्रुवीकरण नहीं, समाधान चाहिए
एक रचनात्मक रास्ता उपलब्ध है।
अधिकारी उन कैदियों के मामलों की पारदर्शी और अलग-अलग समीक्षा कर सकते हैं, जिनके नाम बंदी सिंह अभियान के तहत बार-बार उठाए जाते हैं। समीक्षा में वास्तविक सजा, जेल में बिताया गया समय, जेल के भीतर आचरण, लंबित अपील या दया याचिका, सजा में छूट अथवा अस्थायी रिहाई की पात्रता और संबंधित सुरक्षा आकलन को शामिल किया जाना चाहिए। कुछ कैदी कानूनी राहत के पात्र हो सकते हैं। कुछ नहीं भी हो सकते।
महत्वपूर्ण यह है कि फैसले उचित समय के भीतर किए जाएं और उनके कारण स्पष्ट रूप से बताए जाएं।
ऐसा दृष्टिकोण प्रशासनिक देरी को पूरे समुदाय के साथ भेदभाव के प्रमाण के रूप में पेश करने के प्रयासों को भी कमजोर करेगा।
साथ ही पंजाब के राजनीतिक दलों को इस मुद्दे को यह साबित करने की होड़ में नहीं बदलना चाहिए कि सिख हितों का "वास्तविक" प्रतिनिधित्व कौन करता है। राज्य की युवा पीढ़ी बेरोजगारी, नशे, संगठित अपराध, कृषि संकट, गिरते भूजल स्तर और पलायन जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। इन समस्याओं को अतीत को लेकर एक और राजनीतिक टकराव से कहीं अधिक ध्यान मिलना चाहिए। पंजाब को न अपना इतिहास भूलना चाहिए और न ही उसका कैदी बने रहना चाहिए। बंदी सिंहों की बहस भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए यह दिखाने का अवसर है कि सबसे संवेदनशील विरासत से जुड़े मुद्दों का भी कानून, पारदर्शिता और मानवीय संवेदना के माध्यम से समाधान किया जा सकता है।
2027 नजदीक आते हुए असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि बंदी सिंहों के मुद्दे से किस राजनीतिक दल को फायदा होगा। असली सवाल यह होना चाहिए कि क्या पंजाब का नेतृत्व और भारत की संस्थाएं लंबित और उचित सवालों का समाधान इस तरह कर सकती हैं कि पिछली पीढ़ी के घाव अगली पीढ़ी की राजनीतिक विभाजन रेखाएं न बन जाएं।



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